शायरी गुलदस्ता · 8

करो फिर से कोई वादा, कभी न फिर बिछड़ने का… तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है, चलो फिर से मुकर जाना…
शायरी गुलदस्ता · 8 — भाग 1
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