मुमकिन न था…

अख़लाक़-ए-इश्क़ जो कर बैठे कुछ इस क़दर… रुसवाइयों का ये सहारा… अब मुझे मुमकिन न था… ये जो हसरतें हैं मेरी, दबी जा रही हैं… इन्हें मरते हुए देखना… अब मुझे मुमकिन न था… मेरी कमियों ने तुम्हें इशारा जो दिया… कुछ न कर पाना तेरा… अब मुझे मुमकिन न था… उल्फ़त-ए-तन्हाई जो तेरे नाम की… पर तेरा तन्हा यूँ होना… अब मुझे मुमकिन न था… अनकही बातें जो तेरी, हो सके तो सुन सकूँ… यूँ तेरा चुप सा रहना… अब मुझे मुमकिन न था…
मुमकिन न था… — भाग 1मुमकिन न था… — भाग 2
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