सदियों पे इख़्तियार

सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त, दो चार लम्हे बस में थे, दो चार बस जिए। — गुलज़ार
गुलज़ार — सदियों पे इख़्तियार, approved poetry creative
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